उसने-कहा-था

उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

उसने कहा था

लेखक  – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

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बड़े-बड़े शहरों में इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगाए । जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़ों की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरों को चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध में चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले, तंग चक्करदार गलियों में हर एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़कर, ‘बचो खालसाजी’, ‘हटो भाईजी’, ‘ठहरना भाई’, ‘आने दो लालाजी’, ‘हटो बाछा’ कहते हुए सफेद फैंटों, खच्चरों और बत्तखों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि ‘जी’ और ‘साहब’ बिना सुने किसी को हटना पड़े । यह बात नहीं है कि उनकी जीभ चलती ही नहीं । चलती है, पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती है । यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं- हट जा जीणे जोगिये, हट जा करमा वालिए, हट जा पुताँ पयारिए, बच जा लम्बी वालिए। समष्टि में इसका अर्थ है कि तू जीने योग्य है , तू भाग्यों वाली हैं , पुत्रों को प्यारी है , लम्बी उमर तेरे सामने है , तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है ? बच जा । ऐसे बम्बूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं । वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ । दुकानदार एक परदेशी से गुँथ रहा था जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था । “तेरे घर कहाँ है?” “मगरे में, और तेरे? “माझे में-यहाँ कहाँ रहती है?” “अतरसिंह की बैठक में, वे मेरे मामा होते हैं ।” “मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरुबजार में है ।” इतने में दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा । सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुस्कुराकर पूछा- “तेरी कुड़माई हो गई ?” इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया । दूसरे-तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनों मिल जाते । महीना-भर यही हाल रहा । दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा-“तेरी कुड़माई हो गई?” और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला । एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की सम्भावना के विरुद्ध, बोली-“हाँ, हो गई!” “कब?” “कल-देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू ।” लड़की भाग गई । लड़के ने घर की राह ली । रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उँडेल दिया, सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुंचा ।

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“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है । दिन-रात खन्दकों में बैठे-बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं । लुधियाने से दस गुना जाड़ा और मेह और बर्फ ऊपर से पिण्डलियों तक कीचड़ में धंसे हुए हैं । गनीम कहीं दिखता नहीं-घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है । इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े । नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पच्चीस जलजले होते हैं । जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई तो चटाक से गोली लगती है, न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं । “लहनासिंह, और तीन दिन हैं । चार तो खन्दक में बिता ही दिए । परसों ‘रिलीफ’ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सोएँगे । उसी फिरंगी मेम के बाग में मखमल की-सी हरी घास है । फल और दूध की वर्षा कर देती है । लाख कहते हैं, पर दाम नहीं लेती । कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो ।”“चार दिन तक पलक नहीं झपकी । बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही । मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए । फिर सात जरमनों को अकेला मारकर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो । पाजी कहीं के, कलों के घोड़े, संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं और पैर पकड़ने लगते हैं । यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं । उस दिन धावा किया था-चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था । पीछे जनरल साहब ने हट आने का कमान दिया, नहीं तो-” “नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते। क्यों?” सूबेदार हजारासिंह ने मुस्कुराकर कहा-“लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाए नहीं चलते । बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है । एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?” “सूबेदार जी, सच है ।” लहनासिंह बोला-“पर करें क्या ? हड्डियों में तो जाड़ा धंस गया है । सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से जार की बावलियों के से सोते झर रहे हैं । एक धावा हो जाए तो गरमी आ जाए । “उदमी उठ’ सिगड़ी में कोयले डाल । वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फैंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदला दे ।” यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे । ___ वजीरासिंह पलटन का विदूषक था । बाल्टी में गंदा पानी भर-कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला—मै पाधा बन गया हूँ । करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण।” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए । लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा- “अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो । ऐसा खाद का पानी पंजाब भर में नहीं मिलेगा ।” “हाँ देश क्या है, स्वर्ग है! मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमाव जमीन यहीं माँग लूँगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।” ____“लाड़ी होरा को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फिरंगी मेम-” “चुप कर । यहाँ वालों को शरम नहीं । “देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाकू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, होठों में लगाना चाहती है और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं ।” “अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है?” “अच्छा है।” | “जैसे मैं जानता ही न होऊँ! रात-भर तुम अपने दोनों कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा द आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़ रहते हो। कहीं तुम न माँदै पड जाना। जाडा क्या है? मौत है और निमोनिया, से मरने वालों को मुरब्बे नहीं मिला करते ।” “मेरा डर मत करो । मैं तो बुलेल की खडड के किनारे मरूँगा । भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आग आम के पेड़ की छाया होगी ।” वजीरासिंह ने त्यौरी चढ़ाकर कहा- “क्या मरने-मरने की बात लगाई । मरे जर्मन और तुरक ।” “हाँ भाइयों, कुछ गाओ ।” कौन जानता था कि दाढ़ियों वाले घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएँगे, पर सारी खन्दक गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गए, मानों चार दिन से सोते और ही-ही करते रहे हों ।

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दो पहर रात गई है । अँधेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछाकर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है । एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले-पतले शरीर पर । बोधासिंह कराहा। । “क्यों बोधाभाई, क्या है?” “पानी पिला दो।” लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगाकर पूछा—“कहो, कैसे हो?” बोधा बोला-“कॅपनी छूट रही है । रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं । पानी पीकर बोधा बोला दाँत बज रहे हैं।” “अच्छा, मेरी जरसी पहन लो।” “और तुम?” “मेरे पास सिगड़ी है, मुझे गर्मी लगती है, पसीना आ रहा है ।” “ना, मैं नहीं पहनता, चार दिन से तुम मेरे लिए” “हाँ याद आई । मेरे पास दूसरी गरम जरसी है । आज सवेरे ही आई है । लायत से मेम बुन-बुनकर भेज रही है। गुरु ! उनका भला करे यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतराने लगा ।” “सच कहते हो?” “और नहीं झूठ!”—यों कहकर नहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती हो जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुर्ता भर पहनकर पहरे पर खड़ा हआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी । आधा घण्टा बीता । इतने में खाई के मुँह से आवाज आई-“सूबेदार हजारासिंह!” कौन!” लपटन साहब? हकुम हुजूर!” कहकर सूबेदार तन कर फौजी कर सलाम करके सामने हुआ । “देखो, इसी दम धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कौने को में एक जर्मनी खाई है। उसमें पचास से ज्यादा जर्मन नहीं है। इन पेड़ों के नीचेनीचे दो खेत काटकर रास्ता है । तीन-चार घुमाव हैं । जहाँ मोड़े है वहाँ पन्द्रह यहाँ जवान खडे करके आया हूँ । तुम यहाँ दस आदमी छोड़कर सबको अपने साथ करो ले उनसे जा मिलो । खन्दक छीनकर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे गए जा रहो । हम यहाँ रहेगा।” , “जो हुक्म।” सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे । चुपचाप सब तैयार हो गए । बोधा भी कम्बल उतारकर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका । लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बापू सूबेदार ने यहाँ अगुली से बोधा की ओर इशारा किया । लहनासिंह समझकर चप हो गया पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की पास मुँह फेरकर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकालकर पला दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा “लो, तुम पियो ।” लहनासिंह सब समझ गया। मुंह का भाव छिपाकर – “लाओ साहब!” हाथ आगे करते ही सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा बाल देखे । तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पटिटयों वाले बाल एक दिन में कहाँ उड़ गए? शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया। लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे । “क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएँगे?” “लड़ाई खत्म होने पर । क्यों, क्या देश पसन्द नहीं?” “नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गए थे हाँ, हाँ, वहीं जब आप खोते पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मंदिर में जल चढ़ाने को रह गया था।” बेशक, “पाजी कहीं का”, “सामने सनील गाय निकली कि ऐसी बडी मैंने कभी न देखी थी और आप की एक गाला कधे में लगी और पटटे में निकली । ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलमे में मजे है । क्यों साहब. शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजिमेंट की मैस में लगाएँगे।” “हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया।” “ऐसे बड़े-बड़े सींग दो-दो फुट के होंगे।” “हाँ लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे । तुमने सिगरेट नहीं पिया?” “पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ ।” कहकर लहनासिंह खन्दक में घुसा । जब उसे सन्देह नहीं रहा था और उसने झटपट निश्चय कर लिया क्या करना चाहिए । अँधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया। “कौन ? वजीरासिंह?” “हाँ, क्यों लहना?” क्या कयामत आ गई? जरा तो आँख लगने दी होती ।” “होश में आओ । कयामत आई है और लपटन की वर्दी पहनकर आई “क्या?” “लपटन साहब या तो मारे गए हैं या कैद हो गए हैं । उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है । सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा । मैंने देखा है और बातें की हैं । सौहरा साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू और मुझे पीने को सिगरेट दिया है ।” _ “अब मारे गए । धोखा है । सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उधर उन पर खुले में धावा होगा । उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ । अभी बहुत दूर न | गए होंगे । सूबेदार से कहो कि एकदम आवें । खन्दक की बात झूठ है चले जाओ। खन्दक के पीछे से निकल जाओ । पत्ता तक न खुड़ के। देर मत करो ।” “हुकुम तो यह है कि यहीं ….” “ऐसी-तैसी हुकुम की । मेरा हुकुम-जमादार लहनासिंह, जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है । मैं लपटन साहब की खबर लेता “पर यहाँ तो तुम आठ ही हो ।” “आठ नहीं, दस लाख । एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है । चले जाओ।” | लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपट गया । उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल बराबर तीन गोले निकाले । तीनों को तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिए और तीनों में एक-तार-सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा । बाहर की तरफ एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने….. बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तनकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब के गर्दन पर दे मारा और साहब “आख मीन गौट्ट” कहते हुए चित्त हो गए। लहनासिंह ने तीनों गोले बीनकर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट सिगड़ी के पास लिटाया । जेबों की तलाशी ली तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकालकर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया । साहब की मूर्छा हटी । लहनासिंह हँसकर बोला-“क्यों लपटन साहब! मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखी । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगधारी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं । यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर -जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी । साफ उर्दू कहाँ से सीख आए? हमारे लपटन साहब तो बिना डेम के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।” लहना ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी । साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनों हाथ जेबों में डाले । लहनासिंह कहता गया—“चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है, उसे चकमा देने के लिए चार आँख चाहिए। तीन महीने हुए, एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव में आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित है। वेद पढ़-पढ़ाकर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते । हिन्दुस्तान में आ जाएँगे तो गौ-हत्या बंद कर देंगे। मण्डी के बनियों को बहकाया था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक-बाबू पौल्हू राम भी डर गया था । मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूंड दी थी और गाँव के बाहर निकाल कर कहा कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो …..।” साहब की जेब से पिस्तौल चला और लहना की जांघ में गोली लगी । इधर लहना के हैनरीमार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कलाप-क्रिया कर दी । धड़ाका सुनकर सब दौड़ आए । बोधा चिल्लाया-“क्या है?” लहनासिंह ने उसे तो यह कहकर सुला दिया कि एक हड़का हुआ कुत्ता आया था मार दिया और औरों से सब हाल कह दिया। बन्दूकें लेकर सब तैयार हो गए। लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनों तरफ पट्टियाँ बाँधी। घाव माँस में ही था । पट्टियों के कसने से लह निकलना बन्द हो गया । इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े । सिखों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका । दूसरे को रोका । पर यहाँ तो थे आठ (लहनासिंह तक-तककर मार रहा था वह खड़ा था, और सब लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े से मिनटों में वे …. अचानक आवाज आई, “वाह गुरुजी की फतह ! वाह गुरुजी का खालसा !!” और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे । ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे । पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया । एक किलकारी और-“अकाल सिक्खाँ दी फौज आई। वाह गुरुजी दी फतह ! वाह गुरुजी दा खालसा !!” सत्त सिरी अकाल पुरुष !!” और लड़ाई खत्म हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिखों में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर-पार निकल गई। लहनासिंह के पसली में गोली लगी। उसने घाव खन्दक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी साफा कसकर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना के दूसरा घाव-भारी घाव लगा है । लड़ाई के समय चाँद निकल आया था । ऐसा चाँद, जिसके प्रकाश में संस्कृत-कवियों का दिया हुआ क्षयी’ नाम सार्थक होता है । और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में दन्तवीणोपदेशाचार्य कहलाती है । वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर, उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते । इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी । उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डॉक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-आ पहुँची । फील्ड अस्पताल नजदीक था । सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जायेंगे इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और न लाशें रखीं गईं । सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जाएगा । बोर ज्वार में बर्रा रहा था । वह गाड़ी में लिटाया गया । लहना को छोडकर मार जाते नहीं थे । यह देख लहना ने कहा “तुम्हें बोधा की कसम है और सूबेदारनीजी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ ।” “और तुम?” । “मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना और जर्मन मुर्दो के लिए भी गाड़ियाँ आती होंगी । मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ। वजीरासिंह मेरे पास है ही । “अच्छा , पर-” __“बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला । आप भी चढ़ जाओ । सुनिए तो, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था वह मैंने कर दिया ।” गाड़ियाँ चल पड़ी थी । सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा-“तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा? साथ ही चलेंगे । अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना । उसने क्या कहा था?” “अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना ।” गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया_”वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे तर हो रहा है ।

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मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है । जन्म भर का घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं । सारे दृश्यों के रंग साफ हो जा समय की धुन्ध बिलकुल उन पर से हट जाती है । लहनासिंह बारह वर्ष का है । अमृतसर में मामा के यहाँ आया और दही वाले के यहाँ, सब्जी वाले के यहाँ. हर कहीं, उसे एक लड़की मिल जाती है । जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गइ कहकर वह भाग जाती है । एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा कल हो गई, देखते नहीं । यह रेशम के बूटों वाला सालू?” सुनते ही लहनामित को दुःख हुआ । क्रोध हुआ । “वजीरासिंह, पानी पिला दे ।” पच्चीस वर्ष बीत गए । अब लहनासिंह नं. 77 राइफल्स में जमादार हो गया । उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा । न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं । सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमे की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजीमेण्ट के अफसर की चिट्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है । फौरन चले आओ । साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ चलेंगे । सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा । जब चलने लगा तब सूबेदार बेड़े में से निकलकर आया बोला“लहना, सूबेदारनी तुम्हें जानती है! बुलाती है । जा, मिल आ ।” लहनासिंह भीतर पहुँचा । सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर लोग रहे नहीं । दरवाजे पर जाकर मत्था टेकना कहा । असीस सुनी । लहनासिंह चुप । “मुझे पहचाना?” “नहीं ।” ‘तेरी कुड़माई हो गई?-धत्-कल हो गई-देखते नहीं रेशमी बूटों वाला सालू अमृतसर में भावों की टकराहट से मूर्छा खुली । करवट बदली । पसलीका घाव बह निकला । “वजीरा, पानी पिला”-उसने कहा था । स्वप्न चल रहा है । सूबेदारनी कह रही है—“मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया । एक काम कहती हूँ । मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक-हलाली का मौका आया है । पर सरकार ने हम तीनियों की घघरिया पलटन क्यों न बना दी जो सूबेदार जी के साथ चली जाती? एक बेटा है । फौज में भर्ती हुआ उसे उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी न जिया!” सूबेदारनी रोने लगी-“अब दोनों जाते हैं । मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन ताँगे वाले का घोडा दही वाले की दुकान के पास बिगड़ गया था । तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे । आप घोड़े की लातों में चले गए थे और मझे उठाकर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था । ऐसे ही इन दोनों को बचाना, यह मेरी भिक्षा है । तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।” रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई । लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया । “वजीरासिंह, पानी पिला”-उसने कहा था । लहना का सिर अपनी गोद पर रखे वजीरासिंह बैठा है । जब माँगता है, तब पानी पिला देता है । आधा घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला “कौन? कीरतसिंह ?” वजीरा ने समझकर कहा, “हाँ ।” “भइया, मुझे और ऊँचा कर ले । अपने पट्टे पर मेरा सिर रख ले ।” वजीरा ने वैसा ही किया । “हाँ, अब ठीक है, पानी पिला दे, बस अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा । चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना । जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही यह आम है, जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था ।” वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे । कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा फ्रांस और बेलजियम-68वीं सूची-मैदान में घावों से मरा-नं. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह ।

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